सोमवार, 3 सितम्बर 2007

::उफ़्फ़ !! ये बरसात का मौसम:::



उफ़्फ़ !! ये बरसात का मौसम
..........
.....
बरसात की पहली बूँद से
मेरा दिल मचल उठता था...
और तुम..
कपड़े उठाने भाग जाती थी
:::::::::...........
आज कपड़े भीगते हैं..
मेरे पलकों की तरह...
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ये काले बादल...
हमारे देखे हुए
सपने हैं..
जो रखे-रखे
काले हो गये हैं...

आज ये बादल
ग़ुस्सा हैं..
सवाल करते हैं..
और रोते है...
.................
ये बिज़ली..
तुम्हारी यादे हैं.
जो रह रह कर
चमकती हैं ...
मेरी दुनियाँ
कुछ पल के लिए
रोशन करती हैं..
......

तुम्हारी यादो की चमक में
सदियों बाद...
मैं मुस्कुराया हूँ .
... थोड़े आँसू भी बहाया हूँ.

..........
काश !! ..तुम्हारी यादें
मुझ पर यूँ गिरें
की मैं अगली बारिश
न देख पाउ....
......
...

उफ़्फ़ !! ये बरसात का मौसम.

..मस्तो...

4 comments:

Manali Chakravarty ने कहा…

I read this poem before...and this is one of my most favourite poems...each line is just awesome.....

Shilpa Bhardwaj ने कहा…

Tumhare comments bhi tumhari poems ki tarah hote hain, Gaurav... alag, khoobsoorat aur shaaleen!

Thanks
Shilpa

meeta ने कहा…

काश !! ..तुम्हारी यादें
मुझ पर यूँ गिरें
की मैं अगली बारिश
न देख पाउ....
:
achcha zariya hai is tamnna ko jatane ka......congrates....

kush ने कहा…

bahut aachhe masto bhai.. la jawaab hai ye to..