
आज बारिश होती है
धरती का
पोर पोर भिगोती है
तुम टेरिस पर
कुर्सी डाले
अपनी पांव
कुर्सी पर रखे
बारिश देखा करते हो
.............
.....
मैं
किचन में
coffee बनाता हूँ
कभी एक नज़र
तुमको देखा करता हूँ
.............
.....
लो..बन गयी coffee..
अपना मग पकडो...
........
मैं अन्दर
सोफे पे बैठे
तुमको देखा करता हूँ...
तुम..
बारिश...
.....
..........
coffee का मग
तुम्हारे लब से
लगता है..
इक धुंआ सा
उठता है...
....जब बारिश की बूंदें
तुम्हारे स्लीपर पर
पड़ती हैं..
तुम कुर्सी
थोडा और पीछे
करते हो...
.......
..हाय !!
ये बारिश की बूंदें
तुमको छूना
चाहतीं हैं
तुमसे प्यार करतीं हैं..
तुम भी उनसे प्यार करती हो..
पर ये नहीं पता इनको
तुम यूँ ही प्यार करती हो...
मस्तो
११ sep. २००९