बुधवार, 30 जून 2010

रचना

[१]
रात के डेढ़ बज़े
मैं और मेरी ज़ात
मारती हैं
घड़ी की सूइयां
फा तिहा
पढ़तीं हैं
सफेद रोशनी है जहाँ
इक बच्चा
पैदा हो रहा
वहाँ

[२]
न जाने
कौन से
ख़याल में
गुम हो कर
आसमान की
चादर पर
पेन की नोंक
रख दी मैने