सच पता तुमको नहीं...उस रोज़ मैने सच कहा ??
सच कहूँ? मैं सच कहूँ..तुम बिन है खाली ज़िंदगी
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दाँव पर लगता रहा..हर शाम हारी ज़िंदगी
मैं हूँ शायर वक़्त का..मेरी जुआरी ज़िंदगी
बस यही अफ़सोस क्यों कर है हमारी जिंदगी
इक रिहर्सल कि तरह गुजरी है सारी ज़िन्दगी
उंगलियों ने उंगलियों को किस तरह पकड़ा हुआ
उफ्फ !! ये कहना तुम्हारा मैं तुम्हारी ज़िंदगी
दर्द को..खुद से अलग..कैसे भला कर पाउगा
सच तो ये है..दर्द ने..मेरी सवारी ज़िंदगी
सोचना मैं बंद कर देता हूँ तुमको आज से
कर रहा तुमको मुबारक...मैं तुम्हारी ज़िंदगी
क्या ग़ज़ब का खेल है..ये हार है या जीत है..
अब कि मैं जीता था..तो फिर कैसे हारी ज़िंदगी
ख़ुदकुशी करने का मन 'मस्तो' जी हर शब क्यों करे
और जब हो सुबह तो...लगती है प्यारी ज़िंदगी
8 comments:
क्या खूब लिखते हो !
खूबसूरत गज़ल..
"क्या ग़ज़ब का खेल है..ये हार है या जीत है..
अब कि मैं जीता था..तो फिर कैसे हारी ज़िंदगी "
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beautiful..
bahut achhe sher kahe hain.. urdu ki classiki ghazal se achha istefaada kiya hai.. क्या ग़ज़ब का खेल है..ये हार है या जीत है..
अब कि मैं जीता था..तो फिर कैसे हारी ज़िंदगी
aur maqta bahut achha lage..
regards
bahot khub likha hai..... zindagi ki udhed bun ko kash-m-kash ka naam de diya hai ,,... usme haar jeet ka aacha najriya batayhai aapne...
क्या ग़ज़ब का खेल है..ये हार है या जीत है..
अब कि मैं जीता था..तो फिर कैसे हारी ज़िंदगी !
Khoob kahi dost !! Bahut umda alfaaz diye hain zindagi ki kashmaksh ko...
bahut khoobsurat gazal kahi hai... Too good
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