जब भी घर मे आया था..
खुद को तन्हा..पाया था...
देखो सब तो जाग चुके..
सूरज अब क्यो लाया था..
नीम ये पूछे..आँगन का..
मैं किसका सरमाया था...
खुद के मिलने से पहले..
मैं कितना घहबराया था..
तुझ को खो कर ही मैने...
'खुद' मे 'खुद' को पाया था..
'मस्तो' से उम्मीद करो ना..
सबने ये दोहराया था..
3 comments:
"बेहतरीन रचना, नाम भी बढ़िया "मस्तो" ओशो की किसी किताब में पढ़ा था उम्मीद है कि नाम के अनुरूप ही व्यवहार भी मस्त होगा...."
नीम ये पूछे..आँगन का..
मैं किसका सरमाया था...
bhaii kya khoob sher kaha hai..
beautiful and sweet..
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