बुधवार, 30 जून 2010

रब्त-ए-लम्हा

कब थामा था..
कब छूटा था
कब पाया था
कब खोया था
इसका मुझको होश नही...
हाँ जब तक हम साथ रहे
वो पल-पल अब भी ज़िंदा है
साँसों मे ताबिन्दा है
उस पल मे अब भी हरकत है
आँखो मे अब भी
चलता है...
पर कब पकड़ा
कब छोड़ा था
कब जागा
कब सोया था
इसका मुझको होश नही...
इसका मुझको होश नही.

4 comments:

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) ने कहा…

आज 15/05/2012 को आपकी यह पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.com पर पर लिंक की गयी हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!

expression ने कहा…

बहुत सुंदर....

***Punam*** ने कहा…

न कुछ खोया ...न कुछ पाया....

"मैं इक मुद्दत से जिसको खोजता हूँ.....वो इक मुद्दत से मेरे साथ ही है......!! "

Reena Maurya ने कहा…

सुन्दर..बहुत सुन्दर रचना
सुन्दर अभिव्यक्ति:-)