बृहस्पतिवार, 7 अक्तूबर 2010

:::: रोईद: ::.... 8

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लिपटा यहाँ पे जो भी है काली कबा में है
सा से शुरू हुआ था सफ़र ख़त्म सा में है

तो क्या हुआ की तू भी अगर मुझ से है खफा..
हर शख़्स की खुशी यहाँ उसकी अना में है..

खामोशियों मे गुम हुई आवाज़-ए-पा को सुन
जीवन का तैरता हुआ सुर हर सदा में है..

वो आँसुओं को रोक के..कैसी दुआ मे था...??
"ठहरा हुआ वो लम्हा अभी तक खला में है..."* 

मट्टी में दफ़्न हो के मैं बरगद घना बनूँ..
इक और इब्तिदा मेरी..इस इंतिहा में है...

मैं क्या करूँ की तू मेरी पलकों मे ही रहे..?
अब ज़ात डूबती  हुई मेरी दुआ में है.. 

क्या धूप सिमट के मेरी चादर में आ गयी..?
इक इंतिहा को छू के सफ़र..इब्तिदा में है..

'मस्तो' मैं किसलिए उसे अब ढूंढता फिरू
अंदर मेरे वही है..जो बाहर खला में है..

*Wazir Agha ka misra hai..

5 comments:

संजय भास्कर ने कहा…

बेहतरीन ग़ज़ल| मकता कमाल का है .......दिल से मुबारकबाद|

..मस्तो... ने कहा…

शुक्रिया संजय !! :)

सर्वत एम० ने कहा…

अच्छी, बेहतर गज़ल. साफ सुथरा लह्जा. लेकिन सपेलिंग पर ध्यान देने की ज़रूरत है. टंकण की अशुद्धियों ने मज़ा किरकिरा कर दिया. एक-आध अशआर की बहर पर दोबारा गौर करना हिए.
पहली बार आपके ब्लाग पर आया हूं और हौसला अफ्ज़ाई की जगह आलोचना कर के जा रहा हूं. क्या करूं, कुछ आदत ही खराब है.

mridula pradhan ने कहा…

very good.

दिपाली "आब" ने कहा…

तो क्या हुआ की तू भी अगर मुझ से है खफा ..
हर शख़्स की खुशी यहाँ उसकी अना में है ..

kya baat kahi hai.. Too good n true

खामोशियों मे गुम हुई आवाज़ -ए-पा को सुन
जीवन का तैरता हुआ सुर हर सदा में है ..

Waah..shaandar sher

वो आँसुओं को रोक के ..कैसी दुआ मे था ...??
"ठहरा हुआ वो लम्हा अभी तक खला में है ..."*
Behtareen..

Daad kubool karein